कविकुंभ शब्दोत्सव- 2019

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कविकुंभ शब्दोत्सव- 2019

April 27, 2019 - April 27, 2020

दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के न्यू कैम्पस स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) के महात्मा गांधी मंच ऑडिटोरियम में पिछले दिनो कविकुंभ शब्दोत्सव-2019 एवं बीइंग वुम फ़लक-2019 का साझा भव्य आयोजन किया गया, जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि-साहित्यकारों ने प्रारंभिक दो सत्रों में – ‘साहित्य में परम्परा का अर्थ और रचना का संघर्ष’ तथा ‘साहित्य की सत्ता और सत्ता का साहित्य’ विषय पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए। प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ डॉ कमल किशोर गोयनका की अध्यक्षता में परिचर्चा के प्रथम अर्द्ध-सत्र को वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी, डॉ श्याम सुंदर दुबे, शाहिना खान आदि, प्रतिष्ठित कवि-लेखक अशोक वाजपेयी की अध्यक्षता में द्वितीय अर्द्ध-सत्र को कवि लीलाधर मंडलोई, डॉ विनोद शाही, कवयित्री अनामिका आदि ने सम्बोधित किया।

‘साहित्य में परम्परा का अर्थ और रचना का संघर्ष’ विषयक परिचर्चा को सम्बोधित करते हुए कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा- ‘परिचर्चा का यह विषय दिखता बहुत सहज है, लेकिन सरल नहीं है। जो सरल होता है, उतना ही कठिन भी होता है। परम्परा को हम में से बहुत सारे लोग, कुछ आलोचक मित्र और समीक्षक भी बहुत रूढ़ बनाए हुए हैं। परम्परा माने, जैसा ढर्रा चला आ रहा है। साहित्य में ‘ढर्रा’ वाली परम्परा नहीं है। साहित्य में परम्परा-भंजन, रूढ़ि-भंजन बहुत होता है। परम्परा यहां तिरस्कार के लिए नहीं, गतिशील बनाने के लिए होती है, उसमें एक ऐसी ताकत पैदा करने के लिए, जो अपने मूल से जुड़ी हुई हो। वही परम्परा अधिक प्रभाव और प्रवाह लेकर आगे बढ़ सकती है, जो अपने पैदाइशी इलाके से, अपने उद्गम से जुड़ी हुई हो। जिसका पानी निरंतर अपने उद्गम से प्रवाहित हो रहा हो। और आगे चलकर वह अपना पानी बढ़ा भी रही हो। तो परम्परा का मतलब है, परिवर्तन। परम्परा में परिवर्तन अंतरनिहित है। परम्परा में रूढ़ि अंतरनिहित नहीं है क्योंकि परम्परा का परिवार ‘प्यारे’ और ‘खतरनाक’ दोनो तरह के शब्दों से आया है। जैसे रीति-रिवाज, ये भी परम्परा का हिस्सा है। तो परम्परा का कुछ हिस्सा रीति-रिवाज बनते ही उसकी कुछ चीजें तो रूढ़ि बन जाती हैं, जो ऐसी नहीं बन पातीं, परम्परा बन जाती हैं, वो प्रगति करती हैं। जो परम्पराएं बन जाती हैं, वह टूटने के लिए मजबूर होती हैं। रचनाकार का दायित्व है, धर्म है, जो परम्परा को तोड़े, बदले और आगे बढ़े। परम्परा ठहरने का नाम नहीं है। परम्परा किसी निश्चित चेहरे, एक निश्चित कार्यक्रम का नाम नहीं है।
‘संस्कृत में परम्परा का अर्थ है- ‘परस्य परम गमये इति परम्परा।’ अर्थात् जो, दूसरे से दूसरे तक जाए। सवाल उठता है, पहले से दूसरे तक क्यों न जाए? तो पहले से दूसरे तक यानी रीति-रिवाजों में तो वह आ ही चुकी होती है। दूसरे से दूसरे तक वह रीति-रिवाजों का एक हिस्सा होती है, परम्परा वह हिस्सा होती है, जो रूढ़ि होने से बच गई होती है। दूसरे से दूसरे तक जाना, यानी एक से तीसरे तक यानी बहुतों तक जाने का संकेत होता है। तो परम्परा की यात्रा- ‘परस्य परम गमये इति..।’ तो परम्परा एक ऐसी चीज है, जो आगे चलकर उसी तरह समुद्र बन जाती है, जैसे अपने उद्गम से निकली गंगा राह की तमाम छोटी छोटी नदियों के सम्मिलन से वृहद आकार, बड़ा स्वरूप ले लेती है। उद्गम पर लोग उसे आसानी से पार कर लेते हैं, पटना, कोलकाता में उसे उस तरह लांघना संभव नहीं रह पाता है। परम्परा का भी एक सागर है। इसलिए रचनाकारों और पाठकों, दोनो को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो पढ़ता है, वही लिखता है। जो पढ़ेगा नहीं, वह लिखेगा क्या? इसीलिए कहा गया है कि हर पाठक एक कवि है। जैसे ही एक पाठक का सम्बंध रचना से बनता है, उसकी रचना अपना एक अलग रास्ता निकालना शुरू कर देती है। पात्र ही रचनाकारों का असली समुदाय होता है।
‘आज कविता के सामने सबसे बड़ा संकट यह आ गया है कि वो परम्परा को तो आगे बढ़ा रही है लेकिन फ्रीवर्स ने एक बहुत नुकसान किया है, तमाम कवियों की ऐसी कविताएं देखता हूं, जिन्हें पढ़कर बड़ा दुख होता है। ऐसे कवि ये समझते-सोचते हैं कि कविता करना तो बड़ा सरल काम है, टेढ़ी-मेढ़ी लिख दो। हमारे यहां तो अज्ञेय, मुक्तिबोध, धूमिल जैसे कवि हैं। धूमिल की एक लाइन है- ‘लोहे का स्वाद, लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो, जिसके मुंह में लगाम है।’ ये 1975 की कविता है। सोचिए, क्या इसमें छंद नहीं है, लयात्मकता नहीं है? और जो लोग तुक को ही कविता समझते हैं, कभी-कभी उसमें बहुत अच्छी बातें भी होती हैं, लेकिन अक्सर बेतुकी बातें होती हैं। जो रचना का संघर्ष है, कोई अच्छी रचना ही रचनाकार को ढूंढती है कि मैं किसके माध्यम से प्रकट होऊं। लगता है कि रचना का अन्वेषण हमने किया, लेकिन रचना की भाषा की जो परम्परा है, वो हमको रचती है, हमको हमारे उद्देश्य तक ले जाती है। आज हम रचना के संघर्ष को बिना रचना में गए समझ ही नहीं सकते हैं। रचनाकारों ने रचनाकारों को पॉपुलर नहीं बनाया है, बल्कि रचनाएं रचनाकारों को पॉपुलर बनाती हैं। इसलिए रचना से मीलिए, रचनाकार से नाराज रहिए तो कोई बात नहीं। रचना अच्छी है तो उसे जीवन के प्रसंगों से जोड़िए।’

वरिष्ठ कवि-लेखक डॉ श्याम सुंदर दुबे ने कहा – ‘साहित्य में परम्परा एक तरह से साहित्य की ही परम्परा नहीं होती है, वह हमारे सम्पूर्ण इतिहास, समाज और हमारी चित्त वृत्तियों की भी परम्परा होती है। साहित्य की परम्परा, कोई ऐसी स्वतंत्र परम्परा नहीं है, जिसे सिर्फ साहित्य की परम्परा के रूप में विवेचित किया जाए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जब लिखते हैं कि साहित्य का इतिहास मानवीय समुदाय के चित्त वृत्तियों का इतिहास है, तो इसका अर्थ है, साहित्य एक तरह से मानवीय चित्त वृत्तियों के निरंतर उदात्त होने के जो लक्षण हैं, उऩको लेकर अग्रसर हो रहा है। और इस रूप में भाषा, स्मृति और हमारे द्वारा रचित विभिन्न प्रकार के जो मिथक हैं, वह सब साहित्य में संदर्भित होते रहते हैं। साहित्य की परम्परा हमारे उन सभी मानसिक, भावात्मक, निर्माण कर्मों की सत्ता है, जिसके माध्यम से हम अक्षरों में और भाषा में स्मृतियों का उपाख्यान करते हैं। महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या ये जो मेरा ‘मैं’ है, क्या ये ‘मैं’-केंद्रित मैं ही हूं? यह संभव ही नहीं है।
‘हमारा जैविक कोश हमे प्रवाहित पीढ़ियों से प्राप्त है। जैविक परमाणु हमारे भीतर एक परम्परा लेकर चल रहे हैं। मान लीजिए, मैं लोक की बात करूं तो हमारे समय के बहुत सारे कवि, भले ही उनकी भाषा का मुहावरा भिन्न हो, भले ही उनकी रचनात्मक प्रक्रिया का लहजा भिन्न हो, लेकिन वे सब लोग लोक से संवेदित रहे हैं। वह चाहे केदारनाथ अग्रवाल हों या यहां हमारे सामने बैठे अशोक वाजपेयी, चाहे लीलाधर जगूड़ी हों। इन कवियों के भीतर वह लोक संस्कार जिन लोक संस्कारों से प्रेम, जिन लोक संस्कारों के माध्यम से हमारे भीतर की चेतना में निहित हमारी परम्परा के उन अंशों को लिया जाता रहा है, जिन अंशों से हम अपनी समकालीनता की पहचान करते रहते हैं। लोक हमे निरंतर उद्रेकित करता है। मैं नंददुलारे वाजपेयी की एक बात को यहां स्पष्ट करना चाहूंगा। उन्होंने कहा कि हमारे पास जो नए कवि-साहित्यकार आए, वे उन गांवों से आए हुए हैं, उन घरों से आए हुए हैं, जिन घरों में रामचरित मानस की एकाध पोथी होती थी, उन कवियों के माध्यम से वो परम्परा हमारे काव्य में निरंतर आती रही है।’

डॉ कमल किशोर गोयनका ने कहा – ‘मैं कहानियों के माध्यम से आप को बताना चाहता हूं कि कैसे लेखक परम्परा से जूझता है और कैसे नई प्रक्रिया में रचना के जीवन को आविष्कृत करता है। ‘गोदान’ में जो गऊ है, वह हिंदू धर्म के लिए क्या है, सबको पता है। रचना के आरंभ में ही होरी गाय के प्रति समर्पित होता है। और उसके साथ यह कितनी बड़ी त्रासदी होती है कि गोदान के लिए उसके पास गाय ही नहीं बचती है। ‘गोदान’ की जो रचना प्रक्रिया है, उसको ध्यान में रखते हुए उल्लेखनीय है कि जब होरी की मृत्यु होती है, गोदान गोबर के हाथ से होता है। हमारी परम्परा है कि पुत्र अपने पिता की मृत्यु पर गोदान करता है। प्रेमचंद में क्रूर आस्थाओं के प्रति जो आक्रोश है, वह उनको कैसी रचना के लिए प्रतिबद्ध करता है, रचना में उनका धर्म के प्रति आस्था और विश्वास कैसे टूटता है, फिर भी उन आस्थाओं से टकराते हुए उनके भीतर का लेखक जिंदा रहता है।
‘परम्परा और आस्था के सम्बंध में अब एक दूसरी बात। हर व्यक्ति के, समाज के जीवन में विवाह का महत्वपूर्ण स्थान होता है। विवाह को कथानक से हटा दिया जाए तो रामायण और महाभारत का सृजन ही संदिग्ध हो जाए। मतलब, परिवार हमारे जीवन का अंग है, हिस्सा है। प्रेमचंद ‘गोदान’ में परम्परा को टूटते हुए देखते हैं और उसका समर्थन भी करते हैं। प्रेमचंद उस पूरी धार्मिक परम्परा से संघर्ष करते हुए ‘गोदान’ जैसी कालजयी रचना हमारे सामने लाते हैं। उसके सृजन में परम्परा से एक नई तरह की आधुनिकता का जन्म होता है। उनकी ‘कफ़न’ कहानी का भी कुछ ऐसा ही सत्य है कि मृत शरीर को एक कफ़न चाहिए। उसमें भी वह उन धार्मिक आस्थाओं पर चोट करते हैं, जो परम्परा से चली आ रही है। यही लेखक का आत्मसंघर्ष होता है, जिसमें परम्परा से नई तरह की आधुनिकता का जन्म होता है। लेखक जब परम्परा से टकराता है तो समाज के लिए अनुपयोगी मूल्यों से लड़ता भी है और नए तरह के मूल्यों का सृजन भी करता है।’
बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कहा – ‘हमारे मानस में, जीवन में जो सहस्त्राब्दियों से चला आ रहा है, वह नए तत्वों को तब आत्मसात करता है, जब कोई वैसा तत्व उसके अनुकूल हो। बिल्कुल प्रतिरोधी तत्व आत्मसात नहीं हो पाते हैं। और वही परम्परा टूटती है। हर युग में परम्परा टूटती रही है लेकिन वास्तविक सच तो ये है कि वे परम्पराएं टूटी नहीं, बल्कि परिवर्तित रूप में हमारे सामने आती रहती हैं। शाहिना खान ने कहा – ‘हर परम्परा अपने समय की आधुनिकता होती है। परम्परा मूल्यों की वाहक है, विरोधी नहीं, पूरक है। वह एक गतिशील प्रक्रिया है। परम्परा आधुनिकता की विरोधी नही है। वह अपने समय के परिवर्तन और निरंतरता को जारी रखती है। इसीलिए रामायण और महाभारत में दर्शाए गए आदर्श आज भी हमारी परम्परा में शामिल हैं। उस जमाने के आदर्श आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण और स्वीकार्य बने हुए हैं। इसी तरह हिंदी साहित्य में हर मिथक परम्परा को संजोए हुए हैं। कालजयी रचनाएं समय विशेष में प्रासंगिक होती हैं।’

परिचर्चा के प्रथम सत्र के अंत में कवि डॉ विनोद शाही की अध्यक्षता एवं प्रतिष्ठित युवा आलोचक आशीष कुमार मिश्र के संचालन में युवा कवि विहाग वैभव, अदनान कफ़ील दरवेश, कवयित्री वंदना गुप्ता एवं अनुपम सिंह ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इस अवसर पर साहित्य मनीषियों ने रंजिता सिंह द्वारा संपादित पुस्तक ‘शब्दशः कविकुंभ’ एवं पत्रिका ‘कविकुंभ’ के अप्रैल अंक का लोकार्पण किया।

दूसरे सत्र की परिचर्चा का विषय रहा – ‘साहित्य की सत्ता और सत्ता का साहित्य’। इस सत्र के अध्यक्ष के रूप में सम्बोधित करते हुए ख्यात कवि-लेखक अशोक वाजपेयी ने कहा – ‘ऐसा कुछ पूर्वग्रह बन गया है कि सत्ता सिर्फ राज्य में केंद्रित होती है। राज्य में निश्चय ही वह होती है, यानी राजनीति में, लेकिन वह अपनत्व में भी होती है, विचारधारा में भी होती है। बाजार की भी सत्ता है। हमारे समय में तो झूठ की भी बहुत बड़ी सत्ता है। इससे पहले इतनी तेजी से प्रभावित करती सत्ता नहीं थी। और शैक्षणिक सत्ता। हम में से बहुत सारे लोग एक जमाने में अपनी शैक्षणिक सत्ता, अपने साहित्य के लिए संघर्ष करने वाले होते थे। और जो शैक्षणिक प्रतिष्ठान थे, नए साहित्य को, नई प्रतिभा को दूर रखते थे। इन सब सत्ताओं में आपस में द्वंद्व भी होता है, संघर्ष भी होता है, तनाव भी। साहित्य के पक्ष में ये कहा जा सकता है कि अन्य कलाओं के मुकाबले साहित्य को सत्ता के संसाधनों की कम से कम दरकार होती है। और इसका व्यापक सत्ता से जो सम्बंध है, वो अधिक दरकार का नहीं। पद्मश्री पुरस्कार पाने के लिए बहुत से संगीतकार, नृत्यकार वर्षों से राजनेताओं के पास परिक्रमाएं करते रहते हैं। उन्हे लगता है कि इससे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है। लेकिन साहित्य में पद्मश्री मिल जाए तो प्रतिष्ठता खटकती है, क्योंकि साहित्यकारों के बीच इसकी कभी प्रतिष्ठा नहीं रही। दो चार साहित्यकारों को छोड़ दें तो पचास वर्षों में कायदे के लेखकों को कभी ऐसा पुरस्कार मिला ही नहीं।
उन्होंने कहा कि ‘सत्ता से सिर्फ साहित्य नहीं, कुछ कलाओं के रिश्ते के बारे में भी सोचना चाहिए। दिनकर और श्रीकांत वर्मा, दोनो को सत्ता का साथ मिला लेकिन दोनों से सत्ता की, श्रीकांत वर्मा ने कुछ ज्यादा गहरे सत्ता की आलोचनाएं की हैं। श्रीकांत वर्मा की कृति ‘मगध’ तो सत्ता की अंततः विफलता का सृजन है। साहित्य की जवाबदेही बहुत बड़ी है। आजकल एक सवाल खूब सुना जाता है कि साहित्य की समाज के प्रति क्या जवाबदेही है, लेकिन मैं पिछले पचास वर्षों से पूछ रहा हूं कि समाज की साहित्य के प्रति क्या जवाबदेही है? हम से बहुत कुछ चाहते हो, हमको किसी ने चाहा? आप ने हमारे लिए किया क्या है कि हम आप के प्रति जवाबदेह हों? आज खासतौर से हिंदी समाज, अपने लेखकों-साहित्यकारों से बेगाना समाज है। हिंदी समाज की जनसंख्या पचास करोड़ है लेकिन उसकी न तो पुस्तकों में कोई रुचि है, न लेखक-साहित्यकारों में। पुस्तकें जितनी छपती हैं, सौ-डेढ़ सौ प्रतियां बेचारा लेखक ही खरीद लेता है, अपने मित्रों को बांटने के लिए। इन सब बातों के बावजूद, फिर भी समाज के प्रति कुछ तो जवाबदेही साहित्य की है ही। इसकी जवाबदेही संस्कृति, भाषा और परम्परा के प्रति भी है। इस समय भाषा पर बहुत बड़ा संकट है।
‘इस समय हिंदी भाषा का जितना दुरुपयोग है, जितना लांछन, कीचड़ उछाल है, लगता है, जैसे ये करने के अलावा कोई महत्वपूर्ण संवाद हो ही नहीं सकता। उसकी इन सबके प्रति जवाबदेही है, पर साहित्य की सत्ता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। साहित्य की लोकतंत्र और संविधान के प्रति जवाबदेही है। इस समय का हिंदी साहित्य, हिंदी समाज का सच्चा प्रतिपक्ष है। राजनीति में कोई प्रतिपक्ष नहीं है, सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं, इस समय साहित्य ही हिंदी की राजनीतिक सत्ता का प्रतिपक्ष है। उन्नीस छप्पन-सत्तावन के दशक में अज्ञेय जी के एक लेख को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। उसमें उन्होंने अपने बारे में भी लिखा था। उस विवाद में अज्ञेय जी की लिखी एक महत्वपूर्ण बात छूट गई थी। उन्होंने लिखा था- ‘हिंदी अपने आरंभ से ही प्रतिष्ठान के विरोध की भाषा रही है। न कभी प्रतिष्ठान ने उसको अपनाया, न कभी उसे ये सोचने का कारण या आधार रहा कि वो प्रतिष्ठान के साथ सम्पृक्त है या हो सकती है। इस विरोध की भावना ने उसे एक विलक्षण आत्मविश्वास दिया। हिंदी का यह प्रतिष्ठान विरोधी स्वायत्त सत्ता का भाव देश के आजाद होने तक बना रहा। आजादी मिलने पर कुछ दिनो के लिए ऐसा लगा कि हिंदी प्रतिष्ठान द्वारा अपना ली जाएगी और उससे कुछ असमंजस का भाव भी उत्पन्न हुआ लेकिन ये स्थिति बहुत दिनो तक नहीं रही। उसके कारणों में जाना यहां आवश्यक नहीं है।’
‘साहित्य को ये प्रश्न पूछने का हक, नैतिक बल कहां से मिलता है कि वो दूसरो पर प्रश्न उठाए? ये हक उसको इसलिए मिलता है कि साहित्य स्वयं अपने पर भी प्रश्न उठाता है। साहित्य की पूरी परम्परा में हमने अपने पर भी प्रश्न उठाए हैं। हम अपने पर भी संदेह करते हैं, इसलिए हमे ये हक है कि हम आप पर भी संदेह करें। अगर हम अपने पर संदेह नहीं करेंगे, ये कहेंगे कि सिर्फ साहित्य के पास सच है, बाकी किसी और के पास नहीं है तो ये साहित्य की तानाशाही स्थापित करना होगा। ये अवांछनीय होगा। बाकी सब धर्म, राजनीति, विचारधारा, ये सब अपनी सत्ताएं स्थापित करती हैं, ये सभी सत्ताएं अंकुश करती हैं, साहित्य अपनी कोई सत्ता स्थापित नहीं करता। जो सत्ताएं स्थापित करने वाले लोग हैं, या शक्तियां हैं, उनके बरअक्स वह एक तरह के लोकतंत्र की कल्पना करता है। साहित्य, मनुष्य का एकमात्र टिकाऊ लोकतंत्र है। उसमें निषाद, केवट, नायक-खलनायक, राम-रावण, सबके लिए जगह है। साहित्य के दो चतुर्भुज हैं। पहले चतुर्भुज में कल्पना, स्मृति, संरचना और दृश्य। इनके बिना साहित्य नहीं हो सकता। साहित्य को दूसरे चतुर्भुज की भी आवश्यकता है। वो है, प्रश्नवाचकता, साहस, निर्भीकता और अंतःकरण। आज जब अंतःकरण की आवाज बहुत कम सुनी जाती है, आज जब झूठ बहुत लोकप्रिय है, मीडिया से लेकर राजनीति तक, एक तरह से अविकल साम्राज्य स्थापित है, तब साहित्य का काम बिना डरे, बिना सकुचाए, निडर होकर सच बोलना और दूसरों को भी निडर बनाना है। साहित्य से अमरता भले संभव न हो, निडरता जरूर संभव है। उस निडरता से बने रहें, उससे न हटें, ये बहुत जरूरी है। बाद में जाकर जब लोग कह सकेंगे कि यह ऐसा समय था, जिसमें लोगों के पास निर्भीकता, अंतःकरण और साहस था।’

कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा – ‘एक समय तुलसीदास का था, जिन्होंने सत्ता की तरफ कभी देखा ही नहीं, और एक आज का समय है। साहित्यिक परंपरा में जब उन महान कवियों को देखते हैं, उनकी सत्ता से दूरी और अपनी बात कहने की ताकत, जो उन्होंने अर्जित की, उसे भी देखते हैं। आज जो हो रहा है, आज किसी भी आरोपी की निशानदेही होती है, जुर्म ठीक उसी वक्त तय हो जाता है। और हत्या भी। बिना किसी न्याय प्रक्रिया की स्वीकृति के। हाल के वक्त में जिन साहित्यकारों की हत्याएं हुई हैं, वे साहित्य के साथ थे, सत्ता के विरोध में। जो सत्ता में थे, क्या वे साहित्यकारों के विरोध में थे, यह हमारे लिए एक बड़ा सवाल है। इस एक उदाहरण से आपको साहित्य की सत्ता का पता चलता है कि अगर वो सत्ता नहीं होती तो हत्या के कारण भी नहीं होते। तो इस बदले हुए समय में सत्ता और साहित्य के सम्बंधों का मूल्यांकन करना बहुत जल्दी का मामला होगा, क्योंकि एक रेखीय, एक ध्रुवीय व्यवस्था में, जो कुछ भी घटित हो रहा है, यद्यपि उसमें साहित्य के लोगों की भागीदारी का हिस्सा बहुत ज्यादा नहीं है। आज भक्तिकालीन जमाना नहीं है। उनका साहित्य नए युग को आविष्कृत करने की बातें करता था। वह स्थिति एकदम उलट चुकी है। यदि सत्ता का प्रतिनिधि हम किसी नेता को मानें, किसी ब्यूरोक्रेट को मानें, तो वहां भी आपको एक चीज दिखाई देगी कि उनमें भी कई ऐसे रहे हैं, जो सत्ता में थे, लेकिन सत्ता के विपक्ष में ही बने रहे। क्या आज वह सब आसान रह गया है। श्रीकांत वर्मा की याद रखना बहुत जरूरी है। कांग्रेस पार्टी के महासचिव थे। सत्ता के भीतर रहते हुए उन्होंने ‘मगध’ जैसी कविताएं लिखीं, जिसमें प्रकारांतर से उसी सत्ता का विरोध था, जिसमें वह थे। इस बदले हुए समय में सोचिए कि क्या आज साहित्य और सत्ता के सम्बंध बिल्कुल वैसे ही हैं, मुझे लगता है, नहीं हैं, ये सबसे बड़ी चिंता का विषय है।’

कवयित्री अनामिका ने कहा – ‘साहित्य की सत्ता और सत्ता का साहित्य’ में दो अर्थ निकलते हैं। ‘साहित्य की सत्ता’ में जो अर्थ है, वह सत्य की सत्ता वाला है। दूसरा ‘सत्ता का साहित्य’ के अनेकार्थ हैं। जब भी किसी राजनेता की पुस्तक डाक से घर में आती है, तो मुझे सबसे पहले, आज से पचीस साल पहले अपने पिता के मुंह से सुनी हुई बात याद आती है। वह कहते थे, ‘जानती हो, सचाई की सबसे बड़ी ताकत क्या है, वह ये कि झूठा से झूठा व्यक्ति भी अपनी सचाई सिद्ध करना चाहता है।’ तो कितना भी अनाचार कोई करता हो, शक्ति का, सत्ता का दुरुपयोग करता हो, वो अपने को कवि-मनीषी ही सिद्ध करना चाहता है। सत्य के पक्ष में खड़े लोगों की यही सबसे बड़ी ताकत है, जो कबीर की तरह सोचते हैं। ये जो समानांतर सत्ता, फकीरी की जो बादशाहत है, साहित्यकारों में हमेशा से रही है। सच बोल देने की ताकत, चाहे जो हो जाए। ये जो बेखुदी, ये जो मस्तानापन है, शायद उन लोगों को सबसे ज्यादा भाता है, जिन्हे कविता लिखने की फुर्सत नहीं है मगर जो कवि को अपना आदमी मानते हैं। मैं जब भी किसी रिक्शे वाले, किसी मजदूर से गप्प करती हूं, तो मुझको ये लगता है, उसको कहीं से पता चलता है कि इसका कविता से कुछ लेना-देना है, तो मुझे उसकी आंखों में विश्वास दिखता है। मुझे लगता है कि जिन लोगों को कविता पढ़ने की फुर्सत नहीं है, जो मेहनतकश हैं, रोज-रोज, तिल-तिलकर अपने गला रहे हैं, जिनके लिए राजनीतिक सत्ता सिर्फ नारों में सोचती है, उनको लोगों को गहरा विश्वास है, ये जो कवि है, किसी धुन में रहता है, ये अपना आदमी है। जब हमारे ऊपर कोई संकट होगा, ये अपना आदमी हमारी तरफ से बोलेगा।
‘साहित्य की या साहित्यकारों की स्थिति संयुक्त परिवार के बूढ़े जैसी है, जो किसी तरफ बैठा खाट पर खांसता रहता है, कोई उसे गौर से देखता नहीं, उसके पास बैठता नहीं, लेकिन सबके मन में ये विश्वास रहता है कि ये जो बूढ़ा है, इसके पास कुछ है। शब्द सीढ़ियां हैं, जो मौन की छत तक ले जाती हैं। उसी तरह ज्ञान-संज्ञान है, वो भी सीढ़ियां है, जो हमे प्रज्ञा की छत तक ले जाती हैं। अब ये जो ज्ञान के खाते हैं, बहुत ज्यादा हैं। साहित्यकारों की जिम्मेदारी बनती है कि जो मनुष्य दूसरे महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, उनके लिए, उनके विश्वास को बनाए रखने के लिए ज्ञान के खाते को बढ़ाते जाएं। जो सत्ता के साथ हैं, भीतर हैं, हम उनका भी बहिष्कार नहीं, तिरस्कार करें लेकिन उनको भी अपना प्रज्ञा कोश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करें ताकि वे हमे भी भीतर की बात दें, जिससे जो हम पर विश्वास करते हैं, हम उसको बनाए रखें, उन्हें कमजोर नहीं पड़ने दें।’

कवि डॉ विनोद शाही ने कहा – ‘अब जो समय है, उसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है। हमे जानना होगा कि आखिर ऐसा हुआ क्या है। सत्ता विकेंद्रीकृत होकर सब लोगों के बीच में बैठ गई है। राजनीतीकरण की ऐसी स्थिति आई है कि उससे कोई शून्य खाली नहीं रहा है। इसीलिए आज ये कह पाना कठिन है कि कौन सत्ता के पक्ष में है, कौन विरोध में। भक्तिकाल अथवा सुदूर बीते जिन समयों का बात की जाती है, तब साफ साफ परिभाषित था कि ये सत्ता है, ये साहित्य है। ये शासक है, ये साहित्यकार है। हालांकि मेरा मानना है, कोई काल ऐसा नहीं रहा, जब साहित्य और सत्ता को एक-दूसरे जुड़ा देखा गया हो, क्योंकि वक्त बहुत पीछे चला गया होता है। उस वक्त का हम सरलीकरण कर लेते हैं, तय कर लेते हैं कि ये उधर है, वो इधर है। नाथ और सिद्ध, सत्ता से सीधा रिश्ता तो उनका नहीं होता था, वे बाहर बैठे हैं, जब हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा जाता है, आदिकाल की बात की जाती है, उस समय के सिद्धों, नाथों की नहीं, उस समय में दरबारों के भीतर बैठे लोगों के साहित्य की चर्चा करते हैं। दरबारों में बैठकर, सत्ता के केंद्र में बैठकर जो साहित्य लिखा गया, वो तो इतिहास में आ गया।
‘जिनका सत्ता से कोई लेना-देना नहीं था, उन्होंने जो लिखा, वह इतिहास से छूट गया या छोड़ दिया गया। साहित्य के सारे इतिहास आधुनिक काल के हैं। इससे हिंदी साहित्य के इतिहास का पता नहीं चलता है। इससे हिंदी साहित्य के बारे ठीक इतिहास बोध नहीं होता है। इतिहास बोध हम रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी का पाते हैं, जिन्होंने आधुनिक दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा। इस तरह छूट गया नाथों, सिद्धों का साहित्य निर्गुणियों के साहित्य में बदल जाता है। वह साहित्य आज भी लोगों के बीच खड़ा है। उसका सत्ता से सीधा रिश्ता नहीं है। वह सत्ता के प्रतिपक्ष में खड़ा है और उसके भीतर से परम्परा अपने आप विकसित होती चली जाती है। ये है सत्ता के साहित्य और साहित्य की सत्ता के इतिहास का सच। सीधे-सीधे नजर आता है कि जिस साहित्य की अपनी सत्ता है, उसके भीतर साहित्य निकलता चला जाएगा। भक्तिकाल की बात हो रही है, संतन कहां सीकरी सो काम, उन्होंने सत्ता का प्रतिपक्ष निर्धारित किया, लोगों के भीतर बने रहे, चलते रहे। सत्ता के साहित्य का कौन नामलेवा हो सकता है। सत्ता के साहित्य का ये हस्र होता है। सत्ता के केंद्र में साहित्य का दायरा सीमित हो जाता है। सत्ता के साथ खड़ा रचनाकार समाज और मनुष्य को शासक की दृष्टि से देखता, लिखता है। सत्ता के प्रतिपक्षी रचनकार का दायरा बहुत बड़ा होता है। रचना से जीवन के स्रोत पैदा होते हैं, सत्ता का आम जन पर अंकुशवादी सृजन ऐसा नहीं हो सकता।’

कवि डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा – ‘साहित्य की अपनी सत्ता, अपनी गरिमा होती है, उसके सामने उससे बड़ा कोई नहीं होता है। हम दिल्ली में बैठे हैं। ‘साहित्य की सत्ता और सत्ता का साहित्य’ पर हमारे लिए बताना बहुत आसान हो सकता है। जब नादिरशाह ने कत्लेआम का हुक्म दे दिया, तब जो उनका शाही शायर था, जिसका काम बादशाह की तारीफ़ करना था, तब उसने शासक को एक शेर लिखकर भेजा, उस शेर ने छह दिन का कत्लेआम एकदम रोक दिया था। दुनिया भर में दर्जनों कवि-साहित्यकार, पत्रकार, लेखक मारे गए, उनका शरीर मारा गया, उनका सृजन जिंदा है। शब्द जिंदा रहते हैं, अक्षर जिंदा रहते हैं- ‘चरागों से कहो, महफ़ूज रखें, अपनी-अपनी लौ, उलझना है उन्हें कुछ सरफिरी पागल हवाओं से।’

हिमालयन ग्रुप के चेयरमैन एवं हिंदी-उर्दू-फ़ारसी साहित्य में गहरी अभिरुचि रखने वाले डॉ एस फारुख ने कहा – ‘मैं अपनी बात एक शेर से शुरू करता हूं- ‘मुझे अपनी सचाई पर भी शक है इस जमाने में कि जबां कुछ और कहती है, दिल कुछ और कहता है।’ इस जमाने में कवियों की ये बड़ी हिम्मत की बात है कि वे सचाई को निभा रहे हैं। शायर की बड़ी जिम्मेदारी है। शायर की मेहनत का एहसास आम आदमी को उस वक्त होता है, जब अपनी परेशानी में वह उसके शब्दों को याद करता, पढ़ता और उससे अपना हौसला बढ़ाता है। ‘इस दौर में जी लेना इज्जत से, कयामत है, जो दिन भी गुजर जाए, समझो वो गनीमत है।’ मैं फ़लक साहिबा (‘कविकुंभ’ संपादक रंजिता सिंह फ़लक) को मुबारकबाद देता हूं। फ़लक आसमान को कहते हैं। उन्होंने यहां पर सम्मान समारोह भी रखा है। उनके दिल की कैफ़ियत पर एक शेर है कि ‘मैं तमाम तारे उठा-उठा के कवियों में बांट दूं, किसी एक रात वो आसमां का निजाम दे मेरे हाथ में’। इसी वज़ह से उन्होंने ये महफिल सजाई है। किसी को सम्मान देना बड़ा मुश्किल काम है। आज के दौर में जो लोग ये कहते हैं कि ‘इलाही मेरे दोस्त हों खैरियत से कि क्यों घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं।’ कहा गया है कि ‘किसी की कामयाबी को निगाहे कम से मत देखो, बहुत मुश्किल से दुनिया में कोई मशहूर होता है।’ मैं सम्मान से नवाजे जा रहे सभी अतिथियों को मुबारकबाद देता हूं।

कार्यक्रम के प्रारंभ एवं अन्य दो सत्रों में भी स्वागत तथा धन्यवाद ज्ञापन करते हुए ‘कविकुंभ’ संपादक एवं बीइंग वुमन की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजिता सिंह ने कहा- ‘सृजन एक अमृत-जिजीविषा है। ‘कविकुंभ’ की दृष्टि-दिशा वर्तमान कवि-विश्व में अब दूर तक सुनाई दे रही बहुत जरूरी दस्तक, आवश्यक हस्तक्षेप है, जो अपनी शब्द-यात्रा के तीसरे वर्ष में इस समय 29वें पड़ाव पर है। और शब्दोत्सव की दृष्टि से आज का तीसरा वार्षिक संगमन। इससे पहले दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में, दूसरा देहरादून के ओएनजीसी सभागार में हमे देश के लब्ध-प्रतिष्ठ कवि-साहित्यकारों का स्नेह मिला। आज कविता-समय का आत्म-संघर्ष एक-अकेले ‘कविकुंभ’ का नहीं, इस राह की अन्यान्य समस्त साहित्यिक पत्रिकाओं, या कहिए कि पूरी रचनात्मक पत्रकारिता और उसके सृजन-सरोकारों का है! बात बाजार के सिरे से करें या टेक्नोलॉजी के बहाने, आज हम जिस तरह घिरे हैं, किसी की राह आसान नहीं। ‘चांद’ और ‘सरस्वती’ के इतिहास पर जाएं तो ऐसी चुनौतियां महावीर प्रसाद द्विवेदी, महाप्राण निराला, मुंशी प्रेमचंद की राहों में भी कांटों की तरह बिछी रही हैं। आलोचना की आलोचना न तब कम होती थी, न आज हो रही है। वे ही प्रश्न आज भी हमारे आसपास अर्थ बदलकर मंडरा रहे हैं। फिर भी शब्दों की हिफाजत के लिए जहां तक हो सके, आज भी हर असंभव पर पार पाने का समवेत प्रयास जरूरी है, जैसाकि हमारे पुरखों ने किया। आने वाली पीढ़ियों के सामने भी साधन और साध्य, सही और गलत की चुनौतियां उपस्थित रहेंगी।
‘एक प्रश्न आता है, ‘कविकुंभ’ क्यों, तो फिर वही सरल-सा उत्तर कि जरूरी है जन-गण-मन के बीच शब्दों का अनवरत प्रवहमान होना, उनको हरा-भरा बनाए रखना। शब्द सूखेंगे तो सब सूख जाएगा। आज का शब्दोत्सव- 2019, इसलिए कि ‘प्रत्येक शब्द एक ‘मुलाकात’ का दरवाजा होता है, जो अक्सर स्थगित हो जाती है। और शब्द तभी सच्चा होता है, जब वह हमेशा मुलाकात के लिए आकुल हो।’ कवि-पत्रकार अरुण आदित्य के शब्दों में शुरू से ही ‘कविकुंभ’ का बड़ा सीधा-सादा सा आह्वान रहा है – गंगा-जमुनी शब्द आओ मेरे पास, जो बुलाएं, जाओ उनके पास भी। यही ‘कविकुंभ’ का प्रथम भाव-आचमन है, सविनय आवाहन भी। इस सुखद साझा महाभियान में आज यहां उपस्थित आप समस्त अतिथि सुधी-समर्थ रचनाधर्मी हैं। आशा है, हमारी बातें आप सब के लिए भी विश्वसनीय और स्वीकार्य होंगी। देश के 26 राज्यों में, जहां तक ‘कविकुंभ’ की पहुंच हो सकी है, जहां-जहां इसने मंच भी साझा किए, दस्तक दी, इस कठिन शब्द-यात्रा में मिली आत्मीयता ‘कविकुंभ’ का ही सुखद पाथेय नहीं, उन सृजनधर्मियों का विनम्र सम्मान रहा है, जिनके शब्द ‘कविकुंभ’ का संबल बने। आप महानुभावों की आज की उपस्थिति उसी स्नेह और आत्मीयता का एक और सुखद प्रतिफल है, जो रचनाकर्म में हम सबकी आस्था को और अटूट, और प्रगाढ़ कर रहा है। इस शब्दोत्सव से पहली बार ‘शब्दशः कविकुंभ’ से हम एक और जरूरी शुरुआत कर रहे हैं। ‘शब्दशः कविकुंभ’ कृति नहीं, पत्रिका की अब तक की यात्रा का किंचित शब्द-संयोजन है। ‘कविकुंभ’ के उन प्रश्नों का संयोजन, जिन पर कवि-मनीषियों ने जो कुछ कहा और सुधी पाठकों ने सराहा-स्वीकारा है।
‘कविकुंभ’ का सफर तो अभी तीन-चार वर्ष का है, बीइंग वुमन के मंच से स्वयं सिद्धा महिलाओं के सामाजिक सरोकारों को प्रोत्साहित करने का दायित्व हम पिछले चौदह वर्षों निभा रहे हैं। स्वयं सिद्धा, यानी वे महिलाएं, जिन्होंने खुद के श्रम और विवेक से अपने व्यावहारिक जीवन और समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है अथवा उस दिशा में लगातार जूझ रही हैं। बीइंग वुमन के लिए वह जीवन के किसी भी कार्यक्षेत्र की स्वयं सिद्धा महिला हो सकती है, दिल्ली के फुटपाथ पर दशकों से किताबें, पत्र-पत्रिकाएं बेच रहीं संजना तिवारी अथवा विकलांगता पर पार पाते हुए छत्तीसगढ़ की लोक गायकी में स्थान बनाने वाली लक्ष्मी करियारे, उत्तराखंड की नलिनी गुंसाई अथवा वुमनिया बैंड की लड़कियां। बीइंग वुमन के मंच से सम्मानित करने का उद्देश्य न स्वयं का महिमा मंडन करना होता है, न इससे हम किसी के जीवट में इजाफा कर देते हैं। यह मंच इतना निमित्त मात्र होता है कि स्वयं सिद्धा महिला की विशिष्टता से समाज को सुपरिचित कराना। इस अवसर पर सुखद उपस्थिति के लिए मंच-मनीषियों एवं समस्त सुधी साहित्यानुरागियों, देश के विभिन्न राज्यों से पहुंची स्वयं सिद्धा महिलाओं को हमारी बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं।’

परिचर्चा सत्र के बाद हिंदी की जानी-मानी लेखिका ममता कालिया की अध्यक्षता, कवयित्री अनामिका एवं डॉ अनिल सुलभ, प्रतिष्ठित पत्रकार संतोष भारतीय के विशिष्ट आतिथ्य में बीइंग वुमन फ़लक-2019 का सम्मान-सत्र प्रारंभ हुआ। सत्रारंभ पर ख्यात डोगरी लेखिका-कवयित्री पद्मा सचदेव, अनामिका, शीला पांडेय, चित्रा देसाई, ज्योत्सना मिश्रा, लीना मल्होत्रा आदि ने कविता पाठ किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचीं स्वयं सिद्धा महिलाओं को सम्मानित किया गया। दिल्ली की डॉ विजया लक्ष्मी नंदा, शाहिना खान, रीना भरतिया, राखी बख्शी, जॉयश्री अरोरा, बीनू गुप्ता, शिवानी वर्मा, डॉ स्नेह सुधा नवल, तेलंगाना की डॉ अहिल्या मिश्रा, उत्तराखंड की डॉ कुमुदिनी नौटियाल, बिहार की निवेदिता शकील एवं मंजरी श्रीवास्तव को ‘स्वयं सिद्धा शिखर सम्मान’ से समादृत किया गया।
इसके साथ ही वीना मानवी (बिहार), सरोज सिंह (उत्तर प्रदेश), सुनीता नेगी (उत्तराखंड), डॉ राधा जैन (दिल्ली), पीहू पापिया (प.बंगाल), रूबी मोहंती (ओडिशा), निधि नित्या (मध्य प्रदेश), रेनु शर्मा (उत्तराखंड), कल्पना सेन गुप्ता (असम), सपना मिश्रा (गुजरात), उषा रानी रॉव (कर्नाटक), सुनीता अरोड़ा (जम्मू), सोनल दहिया (हरियाणा), वीणा श्रीवास्तव (झारखंड), नेहा भंडारकर (महाराष्ट्र), डॉ मीनाक्षी कहकशा (गाजियाबाद) को ‘स्वयं सिद्धा सृजन सम्मान’ से नवाजा गया। डॉ नीलू नील परी, तृप्ति अग्रवाल, सविता अरोड़ा, सीमा जावेद को ‘स्वयं सिद्धा नवसृजन सम्मान’, अलका आर शर्मा (कनाडा) को ‘स्वयं सिद्धा प्रवासी सम्मान’ और प्रेमलता पंवार (उत्तर प्रदेश), कुसुम लता सिंह (दिल्ली), डॉ उषा मिश्रा (कानपुर), डॉ शिल्पा (उत्तराखंड) को वरिष्ठ नागरिक सम्मान से अभिनंदित किया गया। इस पूरे सत्र का संचालन ‘कविकुंभ’ संपादक रंजिता सिंह ने किया।
शब्दोत्सव एवं सम्मान सत्र के बाद देर शाम अंतिम दो सत्र काव्योत्सव के रहे। इसके अंतर्गत मुशायरे की अध्यक्षता फरहत एहसास, संचालन- खुबैब अहमद ने किया, जिसमें शायरा अलीना इतरत, डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, कवयित्री ममता किरण, शायर डॉ वसीम राशिद, शायरा पूनम तलवार, अमिता परशुराम, गजाला खान, कवि-शायर प्यासा अंजुम, अंकुर रस्तोगी आदि ने अपनी ग़जलों से सामाजिक विसंगतियों पर करारी चोट करने के साथ ही श्रोताओं का भरपूर प्यार हासिल किया। कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता मुंबई से पहुंचे मशहूर शायर इब्राहीम अश्क ने की। डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के संचालन में जाने-माने शायर मुजफ्फर हनफी विशिष्ट अतिथि रहे। उनके अलावा डॉ कृष्ण कुमार प्रजापति, कमलेश भट्ट कमल, राजेश अरोड़ा, हरीश नवल, कैलाश मनहर, नवनीत पांडेय आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

Details

Start:
April 27
End:
April 27, 2020
Event Category:
Website:
https://www.kavikumbh.com/

Venue

‘कविकुंभ’ शब्दोत्सव एवं बीइंग वुमन ‘फ़लक’ – 2019
New Delhi, India

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